Sunday, January 3, 2016

जो पै जानकिनाथ .....



जो पै जानकिनाथ सों नातो नेहु न नीच ।
स्वारथ-परमारथ कहा, कलि कुटिल बिगोयो बीच ॥ १ ॥

धरम बरन आश्रमनिके पैयत पोथिही पुरान ।
करतब बिनु बेष देखिये, ज्यों सरीर बिनु प्रान ॥ २ ॥

बेद बिदित साधन सबै, सुनियत दायक फल चारि ।
राम-प्रेम बिनु जानिबो जैसे सर-सरिता बिनु बारि ॥ ३ ॥

नाना पथ निरबानके, नाना बिधान बहु भाँति ।
तुलसी तू मेरे कहे जपु राम-नाम दिन-राति ॥ ४ ॥
..
:: अरे नीच ! यदि श्रीजानकीनाथ रामचन्द्रजीसे तेरा प्रेम और नाता नहीं है, तो तेरे स्वार्थ और परमार्थ कैसे सिद्ध होंगे? इस अवस्थामें तो कुटिल कलियुगने तुझको बीचमें ही ठग लिया (जिससे लोक-परलोक दोनों ही बिगड़ गये) ॥ १ ॥

(भगवानके प्रेमसे विहीन लोगोंके लिये) वर्ण और आश्रमके धर्म केवल पोथियों और पुराणोंमें ही लिखे पाये जाते हैं । उनके अनुसार कर्तव्य कोई नहीं करता, ऐसे कर्तव्यहीन कोरे भेष वैसे ही हैं जैसे बिना प्राणोंके शरीर हों । (उनसे कोई लाभ नहीं) ॥ २ ॥

सुनते हैं कि वेदोंमें जितने प्रसिद्ध-प्रसिद्ध (यज्ञ आदि) साधन हैं, वे सब अर्थ, काम और मोक्ष और चारोंको देने वाले हैं; किन्तु बिना श्रीराम-प्रेमके उन सबका जानना-मानना वैसा ही है जैसे बिना पानीके तालाब और नदियाँ । सारांश यह कि भगवत्-प्रेम-विहीन सभी क्रियाएँ व्यर्थ हैं ॥ ३ ॥

मुक्तिके अनेक मार्ग हैं और भाँति-भाँतिके साधन हैं, किन्तु हे तुलसी ! तू तो मेरे कहनेसे दिन-रात केवल राम-नामका ही जप किया कर (तेरा तो इसीसे कल्याण हो जाएगा) ॥ ४ ॥

Thursday, October 3, 2013

जानकीनाथ, रघुनाथ .. (राग रामकली, विनय-पत्रिका पद संo ५१)



09.07.2013

जानकीनाथ, रघुनाथ, रागादि-ताम-तरणि, तारुण्यतनु, तेजधामं ।
सच्चिदानंद, आनंदकंदाकरं, विश्व-विश्राम, रामाभिरामं ॥ १ ॥

नीलनव-वारिधर-सुभग-शुभकान्ति, कटि पीत कौशेय वर वसनधारी ।
रत्न-हाटक-जटित-मुकुट-मंडित-मौली, भानु-शत-सदृश उद्योतकारी ॥ २ ॥

श्रवण कुंडल, भाल तिलक, भ्रूरुचिर अति, अरुण अम्भोज लोचन विशालं ।
वक्र-अवलोक, त्रैलोक-शोकापहं, मार-रिपु-ह्रदय-मानस-मरालं ॥ ३ ॥

नासिका चारु सुकपोल, द्विज वज्रदुति, अधर बिंबोपमा, मधुरहासं ।
कंठ दर, चिबुक वर, वचन गंभीरतर, सत्य-संकल्प, सुरत्रास-नासं ॥ ४ ॥

सुमन सुविचित्र नव तुलसिकादल-युतं मृदुल वनमाल उर भ्राजमानं ।
भ्रमत आमोदवश मत्त मधुकर-निकर, मधुरतर मुखर कुर्वन्ति गानं ॥ ५ ॥

सुभग श्रीवत्स, केयूर, कंकण, हार, किंकिणी-रटनि कटि-तट रसालं ।
वाम दिसि जनकजासीन-सिंहासनं कनक-मृदु वल्लिवत तरु तमालं ॥ ६ ॥

अजानु भुजदंड कोदंड-मंडित वाम बाहु, दक्षिण पाणि बाणमेकं ।
अखिल मुनि-निकर, सुर, सिद्ध, गन्धर्व वर नमत नर नाग अवनिप अनेकं ॥ ७ ॥

अनघ, अविछिन्न, सर्वज्ञ, सर्वेश, खलु सर्वतोभद्र-दाताsसमाकं ।
प्रणतजन-खेद-विच्छेद-विद्या-निपुण नौमि श्रीराम सौमित्रिसाकं ॥ ८ ॥

युगल पदपद्म सुखसद्म पद्मालयं, चिह्न कुलिशादि शोभाति भारी ।
हनुमत-हृदि विमल कृत परममंदिर, सदा दासतुलसी-शरण शोकहारी ॥ ९ ॥
(राग रामकली, विनय-पत्रिका पद संo ५१)

हौं रघुबंसमनि को दूत । .. (राग केदारा- गीतावली सुन्दरकाण्ड)



06.07.2013

हौं रघुबंसमनि को दूत ।
मातु मानु प्रतीति जानकि ! जानि मारुतपूत ॥ १ ॥

मैं सुनी बातैं असैली, जे कही निसिचर नीच ।
क्यों न मारै गाल, बैठो काल-डाढ़नि बीच ॥ २ ॥

निदरि अरि, रघुबीर-बल लै जाउँ जौ हठि आज ।
डरौं आयसु-भंगतें, अरु बिगरिहै सुरकाज ॥ ३ ॥

बाँधि बारिधि, साधि रिपु, दिन चारिमें दोउ बीर ।
मिलहिंगे कपि-भालु-दल सँग, जननि ! उर धरु धीर ॥ ४ ॥

चित्रकूट-कथा, कुसल कहि सीस नायो कीस ।
सुह्रद-सेवक नाथको लखि दई अचल असीस ॥ ५ ॥

भये सीतल स्त्रवन-तन-मन सुने बचन-पियूष ।
दास तुलसी रही नयननि दरसहीकी भूख ॥ ६ ॥


:: माता जानकी ! विश्वास करो, मैं रघुवंशमणि भगवन राम का दूत हूँ; मुझे साक्षात पवनपुत्र समझो ॥ १ ॥
नीच निशाचर रावनने जो अंडबंड बातें कहीं हैं, वे मैंने सब सुन ली हैं. वह कालकी दाढोंके बीच पड़ा हुआ है, फिर बैठा-बैठा इस प्रकार गाल क्यों न बजावेगा ॥ २ ॥
मैं रघुनाथजीकी कृपासे आज ही शत्रुका तिरस्कार कर हठपूर्वक तुम्हे ले जा सकता हूँ; किन्तु स्वामी की आज्ञा भंग करने से डरता हूँ और इससे देवताओं का काम भी बिगड़ता है ॥ ३ ॥
मात: ! तुम हृदयमें धैर्य धारण करो; दोनों भाई चार दिन पीछे ही समुद्र पर पुल बाँध, शत्रु को परास्तकर रीछ और वानरों की सेना के सहित तुमसे मिलेंगे ॥ ४ ॥
फिर हनुमानजी ने चित्रकूट की कथा और रघुनाथजी की कुशल कह उन्हें सर नवाया. इससे उन्हें स्वामी का प्रिय दास समझकर सीताजी ने अटल आशीर्वाद दिया ॥ ५ ॥
हनुमान जी के वचनामृत सुनकर सीताजी के कान, शरीर और ह्रदय तो शीतल हो गए; अब नेत्रोंको केवल भगवानके दर्शानोंकी भूख रह गयी है ॥ ६ ॥  

 

यह बिनती रघुबीर गुसाईं .. (राग धनाश्री, विनय-पत्रिका पद सं0- १०३)



02.07.2013

यह बिनती रघुबीर गुसाईं ।
और आस-बिस्वास-भरोसो, हरो जीव-जड़ताई ॥ १ ॥

चहौं न सुगति, सुमति, संपति कछु, रिधि-सिधि बिपुल बड़ाई ।
हेतु-रहित अनुराग राम-पद बढ़ै अनुदिन अधिकाई ॥ २ ॥

कुटिल करम लै जाहिं मोहि जहँ जहँ अपनी बरिआई ।
तहँ तहँ जनि छिन छोह छाँड़ियो, कमठ-अंडकी नाईं ॥ ३ ॥

या जगमेँ जहँ लगि या तनुकी प्रीति प्रतीति सगाई ।
ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों होहिं सिमिटि इक ठाईं ॥ ४ ॥


::  हे रघुनाथ जी ! हे नाथ ! मेरी विनती है कि इस जीवको दुसरे साधन, देवता या कर्मोंपर जो आशा, विश्वास और भरोसा है, उस मूर्खता को आप हर लीजिये ॥ १ ॥
हे राम ! मैं शुभगति, सद्बुद्धि, धन-संपत्ति, ऋद्धि-सिद्धि और बड़ी भारी बड़ाई आदि कुछ भी नहीं चाहता. बस, मेरा तो आपके चरण-कमलोंमें दिनोंदिन अधिक-से-अधिक अनन्य और विशुद्ध प्रेम बढ़ता रहे, यही चाहता हूँ ॥ २ ॥
मुझे अपने बुरे कर्म जबरदस्ती जिस-जिस योनि में ले जाएँ, उस-उस योनिमें ही हे नाथ ! जैसे कछुआ अपने अण्डों को नहीं छोड़ता, वैसे ही आप पलभर के लिए भी अपनी कृपा न छोड़ना ॥ ३ ॥
हे नाथ ! इस संसारमें जहां तक इस शरीरका (स्त्री-पुत्र-परिवारादिसे) प्रेम, विश्वास और सम्बन्ध है, सो सब एक ही स्थान पर सिमटकर केवल आपसे ही हो जाय ॥ ४ ॥

!! श्रीरामदूताय नमो नमः !! 


हे हरि! कवन जतन भ्रम भागै .. (राग बिलावल, विनय-पत्रिका पद संo- ११९)



29.06.2013

हे हरि! कवन जतन भ्रम भागै ।
देखत, सुनत, बिचारत यह मन, निज सुभाउ नहिं त्यागै ॥ १ ॥

भगति-ग्यान-बैराग्य सकल साधन यहि लागि उपाई ।
कोउ भल कहउ, देउ कछु, असि बासना न उरते जाई ॥ २ ॥

जेहि निसि सकल जीव सूतहिं तव कृपापात्र जन जागै ।
निज करनी बिपरीत देखि मोहिं समुझि महा भय लागै ॥ ३ ॥

जद्यपि भग्न-मनोरथ बिधिबस, सुख इच्छत, दुख पावै ।
चित्रकार करहीन जथा स्वारथ बिनु चित्र बनावै ॥ ४ ॥

ह्रषीकेश सुनि नाउँ जाउँ बलि, अति भरोस जिय मोरे ।
तुलसिदास इंद्रिय-संभव दुख, हरे बनिहिं प्रभु तोरे ॥ ५ ॥


::  हे हरे! मेरा यह (संसारको सत्, नित्य पवित्र और सुखरूप माननेका) भ्रम किस उपायसे दूर होगा? देखता है, सुनता है, सोचता है, फिर भी मेरा यह मन अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता. (और संसारको सत्य सुखरूप मानकर बार-बार विषयों में फंसता है) ॥ १ ॥
भक्ति, ज्ञान, वैराग्य आदि सभी साधन इस मनको शांत करनेके उपाय हैं, परन्तु मेरे हृदयसे तो यही वासना कभी नहीं जाती कि 'कोई मुझे अच्छा कहे' अथवा 'मुझे कुछ दे' (ज्ञान, भक्ति, वैराग्य के साधकों के मन में भी प्राय: बड़ाई और धन-मान पाने की वासना बनी ही रहती है) ॥ २ ॥
जिस (संसाररुपी) रात में सब जीव सोते हैं उसमें केवल आपका कृपापात्र जन जागता है. किन्तु मुझे तो अपनी करनी को बिलकुल ही विपरीत देखकर बड़ा भारी भय लग रहा है ॥ ३ ॥
यद्यपि दैववश- प्रारब्धवश मनुष्यके सारे मनोरथ नष्ट हो जाते हैं, सांसारिक सुख उसके भाग्यमें (पूर्व सुकृति के अभाव से) लिखे ही नहीं गए. तथापि वह सुखोंकी इच्छामात्र कर वैसे ही दुःख पाता है जैसे कोई बिना हाथ का चित्रकार (केवल मन:कल्पित) चित्रोंसे अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है और भग्नमनोरथ होकर दुःख पाता है (उसी प्रकार मैं भी भजनसाधनरूप सुकृत किये बिना ही यों ही सुख चाहता हूँ)॥ ४ ॥
आपका हृषिकेश (इन्द्रियों के स्वामी) नाम सुनकर मैं आपकी बलैया लेता हूँ. मेरे मनमें आपका अत्यंत भरोसा है. तुलसीदास इन्द्रियजन्य दुःख आपको अवश्य नष्ट करना ही पड़ेगा ॥ ५ ॥ 


तोसो हौं फिरि फिरि हित .. (राग बिलावल, विनय-पत्रिका पद संo १३३)





25.06.2013

तोसो हौं फिरि फिरि हित, प्रिय, पुनीत सत्य बचन कहत ।
सुनि मन, गुनि, समुझि, क्यों न सुगम सुमग गहत ॥ १ ॥

छोटो बड़ो, खोटो खरो, जग जो जहँ रहत ।
अपनो अपनेको भलो कहहु, को न चहत ॥ २ ॥

बिधि लगि लघु कीट अवधि सुख सुखी, दुख दहत ।
पसु लौं पसुपाल ईस बाँधत छोरत नहत ॥ ३ ॥

बिषय मुद निहार भार सिर काँधे ज्यों बहत ।
योंही जिय जानि, मानि सठ ! तू साँसति सहत ॥ ४ ॥

पायो केहि घृत बिचारु, हरिन-बारि महत ।
तुलसी तकु ताहि सरन, जाते सब लहत ॥ ५ ॥


:: अरे जीव ! मैं तुझसे बार-बार हितकारी, प्रिय, पवित्र और सत्य वचन कहता हूँ, इन्हें सुनकर, मनमें विचारकर और समझकर भी तू सुगम और सुन्दर रास्ता क्यों नहीं पकड़ता ? अर्थात श्रीराम की शरण क्यों नहीं हो जाता ? ॥ १ ॥
छोटा-बड़ा, खोटा-खरा, जो यहाँ संसार में रहता है, उनमें बता, ऐसा कौन है, जो अपना भला न चाहता हो ? ॥ २ ॥
ब्रम्हा से लेकर छोटे-छोटे कीड़े तक सुख से सुखी होते हैं और दुःख से जलते हैं, पशुपालक ग्वाले की तरह परमात्मा जीवरूपी पशुओं को (अज्ञानसे) बांधता, (ज्ञानसे) खोलता और उन्हें (कर्मोंमें) जोतता है ॥३ ॥
विषयों के सुखों को देख. वे तो सर के बोझे को कंधे पर रखने के सामान हैं. अर्थात विषय-सुख में सुख है ही नहीं, इस तरह मन में समझकर मान जा. अरे मूर्ख ! क्यों कष्ट सह रहा है ? ॥ ४ ॥
तनिक विचार तो कर, मृगतृष्णा के जल को मथकर किसने घी पाया है ? अर्थात असत संसार के काल्पनिक पदार्थों में सच्चा सुख कैसे मिल सकता है ? हे तुलसी ! तू तो उसी प्रभुकी शरण में जा, जिससे सब कुछ प्राप्त होता है ॥ ५ ॥  

 

ताते हौं बार बार देव ! .. (राग बिहाग, विनय-पत्रिका पद संo १३४)





22.06.2013



ताते हौं बार बार देव ! द्वार परि पुकार करत ।
आरति, नति, दीनता कहें प्रभु संकट हरत ॥ १ ॥

लोकपाल सोक-बिकल रावन-डर डरत ।
का सुनि सकुचे कृपालु नर-सरीर धरत ॥ २ ॥

कौसिक, मुनि-तीय, जनक सोच-अनल जरत ।
साधन केहि सीतल भये, सो न समुझि परत ॥ ३ ॥

केवट, खग, सबरि सहज चरनकमल न रत ।
सनमुख तोहिं होत नाथ ! कुतरु सुफरु फरत ॥ ४ ॥

बंधु-बैर कपि-बिभीषन गुरु गलानि गरत ।
सेवा केहि रीझि राम, किये सरिस भरत ॥ ५ ॥

सेवक भयो पवनपूत साहिब अनुहरत ।
ताको लिये नाम राम सबको सुढर ढरत ॥ ६ ॥

जाने बिनु राम-रीति पचि पचि जग मरत ।
परिहरि छल सरन गये तुलसिहु-से तरत ॥ ७ ॥ 


:: हे नाथ ! मैं तुम्हारे इसी स्वभाव को जानकर द्वार पर पड़ा हुआ बार-बार पुकार रहा हूँ कि हे प्रभो ! तुम दुःख, नम्रता और दीनता सुनाते ही सारे संकट हर लेते हो ॥ १ ॥ 
जब रावण के भय के मारे इंद्र, कुबेर आदि लोकपाल डरकर शोक से व्याकुल हो गए थे, तब हे कृपालु ! तुमने क्या सुनकर संकोच से नर शरीर धारण किया था? ॥ २ ॥ 
यह समझ में नहीं आता कि जो विश्वामित्र, अहिल्या और जनक चिंता की अग्नि में जले जा रहे थे, वे किस साधन से शीतल हो गए ? ॥ ३ ॥ 
गुह निषाद, पक्षी (जटायु, शबरी आदि स्वाभाव से ही तुम्हारे चरण-कमलों में रत नहीं थे) किन्तु हे नाथ ! तुम्हारे सामने आते ही (इन) बुरे-बुरे वृक्षों में भी अच्छे-अच्छे फल फल गए ! भाव यह कि निषाद, शबरी आदि पापी भी तुम्हारी शरणागति से तर गए ॥ ४ ॥ 
अपने-अपने भाई के साथ शत्रुता करने से सुग्रीव और विभीषण बड़े भारी दुःख से गले जाते थे. हे राम जी ! तुमने किस सेवा से रीझकर उन्हें भरत जी के समान मान लिया ॥ ५ ॥ 
हनुमान जी तुम्हारी सेवा करते-करते तुम्हारे ही समान हो गए । हे राम जी ! उन (हनुमान जी) का नाम लेते ही तुम सब पर भली-भाँति प्रसन्न हो जाते हो ॥ ६ ॥ 
(यह सब क्यों हुआ ? दुःख, नम्रता और दीनता के कारण ही तुमने ऐसा किया) इसलिए हे नाथ ! तुम्हारी (रीझने की) रीति न जानने के कारण ही जगत अन्यान्य साधनों में पच-पचकर मर रहा है । तुम दुखियों, नम्रों और दीनों पर प्रसन्न होते हो यह जानकर जो तुम्हारी शरण हो जाय वह तो तर ही जाता है, क्योंकि कपट छोड़कर तुम्हारी शरण में जानेसे तुलसी- जैसे जीव भी तो संसार-सागर से तर गए ॥ ७ ॥

राम-से प्रीतमकी प्रीति .. (राग बिहाग, विनय-पत्रिका पद संख्या- १३२)






18.06.2013

राम-से प्रीतमकी प्रीति-रहित जीव जाय जियत ।
जेहि सुख सुख मानि लेत, सुख सो समुझ कियत ॥ १ ॥

जहँ-जहँ जेहि जोनि जनम महि, पताल, बियत ।
तहँ-तहँ तू बिषय-सुखहिं, चहत लहत नियत ॥ २ ॥

कत बिमोह लट्यो, फट्यो गगन सियत ।
तुलसी प्रभु-सुजस गाइ, क्यों न सुधा पियत ॥ ३ ॥ 


:: श्रीराम-सरीखे प्रीतम से प्रेम न करके यह जीव व्यर्थ ही जीता है; अरे ! जिस (विषय-सुख) को तू सुख मान रहा है, तनिक विचार तो कर, वह सुख कितना-सा है ? ॥ १ ॥
जहां-तहां, जिस-जिस योनिमें-- पृथ्वी, पाताल और स्वर्गमें तूने जन्म लिया, तहां-तहां तूने जिस विषय-सुख की कामना की, वही प्रारब्ध के अनुसार तुझे मिला (परन्तु कहीं भी तू परम सुखी तो नहीं हुआ?) ॥ २ ॥
क्यों मोह में फंसकर फटे आकाश के सीने में तल्लीन हो रहा है ? भाव यह है कि जैसे आकाश का सीना असंभव है, वैसे ही सांसारिक विषय-भोगों में आनंद मिलना असंभव है ! इसलिए हे तुलसी ! यदि तुझे आनंद ही की इच्छा है, तो प्रभु श्री रामचंद्र जी का सुन्दर गुण-गाकार अमृत क्यों नहीं पीता (जिससे अमर होकर आनादरूप ही बन जाय) ॥ ३ ॥ 


जो पै कृपा रघुपति कृपालुकी .. *(विनय-पत्रिका पद सं0 १३७)

08/06/2013

जो पै कृपा रघुपति कृपालुकी, बैर औरके कहा सरै ।
होइ न बाँको बार भगतको, जो कोउ कोटि उपाय करै ॥ १ ॥

तकै नीचु जो मीचु साधुकी, सो पामर तेहि मीचु मरै ।
बेद-बिदित प्रहलाद-कथा सुनि, को न भगति-पथ पाउँ धरै ? ॥ २ ॥

गज उधारि हरि थप्यो बिभीषन, ध्रुव अबिचल कबहुँ न टरै ।
अंबरीष की साप सुरति करि, अजहुँ महामुनि ग्लानि गरै ॥ ३ ॥

सों धौं कहा जु न कियो सुजोधन, अबुध आपने मान जरै ।
प्रभु-प्रसाद सौभाग्य बिजय-जस, पांडवनै बरिआइ बरै ॥ ४ ॥

जोइ जोइ कूप खनैगो परकहँ, सो सठ फिरि तेहि कूप परै ।
सपनेहुँ सुख न संतद्रोहीकहँ, सुरतरु सोउ बिष-फरनि फरै ॥ ५ ॥

हैं काके द्वै सीस ईसके जो हठि जनकी सीवँ चरै ।
तुलसिदास रघुबीर-बाहुबल सदा अभय काहू न डरै ॥ ६ ॥


Friday, September 21, 2012

ताहिं तें आयो सरन सबेरें ।


राग असवारी

ताहिं तें आयो सरन सबेरें ग्यान बिराग भगति साधन कछु सपनेहुँ नाथ! न मेरें

लोभ-मोह-मद-काम-क्रोध रिपु फिरत रैनि-दिन घेरें
तिनहिं मिले मन भयो कुपथ-रत, फिरै तिहारेहि फेरें

दोष-निलय यह बिषय सोक-प्रद कहत संत श्रुति टेरें
जानत हूँ अनुराग तहाँ अति सो, हरि तुम्हरेहि प्रेरें ?

बिष पियूष सम करहु अगिनि हिम, तारि सकहु बिनु बेरें
तुम सम ईस कृपालु परम हित पुनि न पाईहौं हेरें

यह जिय जानी रहौं सब तजि रघुबीर भरोसे तेरें
तुलसिदास यह बिपति बागुरौ तुम्हहिं सों बने निबेरें



:: हे नाथ ! (केवल तुम्हारा ही भरोसा है) इसी कारण से मै पहले से ही तुम्हारी शरण मे आ गया हूँ ज्ञान, वैराग्य, भक्ति आदि साधन तो मेरे पास स्वप्न में भी नहीं हैं (जिनके बल से मै संसार-सागर से पार हो जाता) मुझे लोभ, अज्ञान, घमंड, काम और क्रोधरूपी शत्रु ही रात-दिन घेरे रहते हैं, ये क्षणभर भी मेरा पिण्ड नहीं छोड़ते इन सबके साथ मिलकर यह मन भी कुमार्गी हो गया है अब यह तुम्हारे ही फेरने से फिरेगा संतजन और वेड पुकार-पुकारकर कहते हैं कि संसार के यह सब विषय पापों के घर हैं और शोक प्रद हैं, यह जानते हुये भी मेरा उन विषयों में ही जो इतना अनुराग है सो हे हरि ! यह तुम्हारी ही प्रेरणा से तो नहीं है ? (नहीं तो मै जान-बूझकर ऐसा क्यों करता?) (जो कुछ भी हो, तुम चाहो तो) विष को अमृत एवं अग्नि को बरफ बना सकते हो और बिना ही जहाज़ों के संसार-सागर से पार कर सकते हों तुम-सरीखा कृपालु और परम हितकारी स्वामी ढूँढने पर भी कहीं नहीं मिलेगा (ऐसे स्वामी को पाकर भी मैंने अपनी काम नहीं बनाया तो फिर मेरे सामान मूर्ख और कौन होगा ?) इसी बात को ह्रदय में जानकार, हे रघुनाथ जी ! मै सब छोड़-छाड़कर तुम्हारे भरोसे आ पड़ा हूँ तुलसिदास का यह विपत्तिरूपी जाल तुम्हारे काटे कटेगा !  

यों मन कबहूँ तुमहिं न लाग्यो ..






राग सोरठ

यों मन कबहूँ तुमहिं न लाग्यो
ज्यों छल छाँड़ी सुभाव निरंतर रहत बिषय अनुराग्यो १ 

ज्यों चितई परनारि, सुने पातक-प्रपंच घर-घरके
त्यों न साधू, सुरसरि-तरंग-निरमल गुनगन रघुबरके ॥ २ 

ज्यों नासा सुगंधरस-बस, रसना षटरस-रति मानी
राम-प्रसाद-माल जूठन लगी त्यों न ललकि ललचानी ॥ ३ 

चन्दन-चंद-बदनि-भूषन-पट ज्यों चह पाँवर परस्यो
त्यों रघुपति-पद-पदुम-परस को तनु पातकी न तरस्यो ४ 

ज्यों सब भाँती कुदेव कुठाकुर सेये बपु बचन हिये हूँ
त्यों न राम सुकृतग्य जे सकुचत सकृत प्रनाम किये हूँ ॥ ५  

चंचल चरन लोभ लगी लोलुप द्वार-द्वार जग बागे
 राम-सीय-आस्त्रमनि चलत त्यों भये न स्त्रमित अभागे ॥ ६

सकल अंग पद-बिमुख नाथ मुख नामकी ओट लई है
 है तुलसिहिं परतीति एक प्रभु-मूरति कृपामई है


जय श्रीसीताराम



:: मेरा मन आपसे ऐसा  कभी नहीं लगा, जैसा कि वह कपट छोड़कर, स्वभावसे  ही  निरंतर विषयों में लगा रहता है जैसे मैं पराई स्त्रियोंको ताकता फिरता हूँ, घर-घर के पापभरे प्रपंच सुनता हूँ, वैसे न तो कभी साधुओंके दर्शन करता हूँ, और न गंगाजीके निर्मल तरंगो के सामान श्रीरघुनाथजीकी गुणावली ही सुनता हूँ जैसे नाक अच्छी-अच्छी सुगंधके रसके अधीन रहती है, और जीभ छ: रसोंसे प्रेम करती है, वैसे यह नाक भगवान् पर चढ़ी हुई मालाके लिए और जीभ भगवत-प्रसादके लिए कभी ललक-ललककर नहीं ललचाती जैसे यह शारीर चन्दन, चन्द्रवदनी युवती, सुन्दर गहने और (मुलायम) कपड़ोंको स्पर्श करना चाहता है, वैसे श्री रघुनाथजीके चरणकमलों का स्पर्श करने के लिए यह कभी नहीं तरसता जैसे मैंने शारीर, वचन और हृदयसे, बुरे-बुरे देवों और दुष्ट स्वामियोंकी सब प्रकारसे सेवा की, वैसे उन रघुनाथजीकी सेवा कभी नहीं की, जो (तनिक सेवासे) अपनेको खूब ही कृतज्ञ मानने लगते हैं और एक बार प्रणाम करते ही (अपार करुना के कारण) सकुचा जाते हैं जैसे इन चंचल चरणोंने लोभवश, लालची बनकर द्वार-द्वार ठोकरें खायी हैं, वैसे ये अभागे श्री सीतारामजीके (पुण्य) आश्रमों में जाकर कभी स्वप्न में भी नहीं थके. (स्वप्न में भी कभी भगवानके पुण्य आश्रमोंमें जाने का कष्ट नहीं उठाया)॥  हे प्रभो! (इस प्रकार) मेरे सभी अंग आपके चरणोंसे विमुख हैं. केवल इस मुखसे आपके नामकी ओट ले रखी है (और यह इसलिए कि) तुलसीको एक येही निश्चय है कि आपकी मूर्ती कृपामयी हैं. (आप कृपासागर होनेके कारण, नामके प्रभावसे मुझे अवश्य अपना लेंगे) 7    

जय जय श्रीसीताराम 

Monday, June 25, 2012



June 26th, 2012
राग टोड़ी

दीनबंधु, सुखसिंधु, कृपाकर, कारुनीक रघुराई ।
सुनहु नाथ ! मन जरत त्रिबिध जुर, करत फिरत बौराई ॥

कबहुँ जोगरत, भोग-निरत सठ हठ बियोग-बस होई ।
कबहुँ मोहबस द्रोह करत बहु, कबहुँ दया अति सोई ॥

कबहुँ दीन, मतिहीन रंकतर, कबहुँ भूप अभिमानी ।
कबहुँ मूढ़, पंडित बिडंबरत, कबहुँ धर्मरत ग्यानी ॥

कबहुँ देव ! जग धनमय रिपुमय कबहुँ नारिमय भासै ।
संसृति-संनिपात दारुन दुख बिनु हरि-कृपा न नासै ॥

संजम, जप, तप, नेम, धरम, ब्रत बहु भेषज-समुदाई ।
तुलसिदास भव-रोग रामपद-प्रेम-हीन नहिँ जाई ॥

* जय सियाराम *

Ashish Pandey  
मोहजनित मल लाग बिबिध बिधि कोटिहु जतन न जाई ।
जनम जनम अभ्यास-निरत चित, अधिक अधिक लपटाई ॥
 
नयन मलिन परनारि निरखि,मन मलिन बिषय सँग लागे ।
हृदय मलिन बासना-मान मद, जीव सहज सुख त्यागे ॥

परनिंदा सुनि श्रवन मलिन भे, बचन दोष पर गाये ।
सब प्रकार मलभार लाग निज नाथ-चरन बिसराये ॥

तुलसिदास ब्रत-दान, ग्यान-तप, सुद्धिहेतु श्रुति गावै ।
राम-चरन-अनुराग-नीर बिनु मल अति नास न पावै ॥


  

Friday, February 24, 2012

कबहुँक अंब, अवसर ..




Tuesday Feb.21, 2012



 
 
राग केदारा

कबहुँक अंब, अवसर पाइ ।

मेरिऔ सुधि द्याइबी, कछु करुन-कथा चलाइ ॥ १

दीन, सब अँगहीन, छीन, मलीन, अघी अघाइ ।
नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ ॥ २

बूझिहैँ 'सो है कौन', कहिबी नाम दसा जनाइ ।
सुनत राम कृपालुके मेरी बिगरिऔ बनि जाइ ॥ ३

जानकी जगजननि जनकी किये बचन सहाइ ।
तरै तुलसीदास भव तव नाथ-गुन-गन गाइ
॥ ४

कबहुँ समय सुधि द्यायबी, मेरी मातु जानकी ..







18 February

राग केदारा

कबहुँ समय सुधि द्यायबी, मेरी मातु जानकी ।
जन कहाइ नाम लेत हौं, किये पन चातक ज्योँ, प्यास प्रेम-पानकी ॥ १

सरल कहाई प्रकृति आपु जानिए करुना-निधानकी ।
निजगुन, अरिकृत अनहितौ, दास-दोष सुरति चित रहत न दिये दानकी ॥ २

बानि बिसारनसील है मानद अमानकी ।
तुलसीदास न बिसारिये, मन करम बचन जाके, सपनेहुँ गति न आनकी ॥ ३

~~* जय सियाराम *~~

जानत प्रीति-रीति रघुराई ..




14 February 2012

राग सोरठ

जानत प्रीति-रीति रघुराई ।
नाते सब हाते करि राखत, राम सनेह-सगाई ॥ १

नेह निबाहि देह तजि दसरथ, कीरति अचल चलाई ।
ऐसेहु पितु तेँ अधिक गीधपर ममता गुन गरुआई ॥ २

तिय-बिरही सुग्रीव सखा लखि प्रानप्रिया बिसराई ।
रन पर्-यो बंधु बिभीषन ही को, सोच ह्रदय अधिकाई ॥ ३

घर गुरुगृह प्रिय सदन सासुरे, भइ जब जहँ पहुनाई ।
तब तहँ कहि सबरीके फलनिकी रुचि माधुरी न पाई ॥ ४

सहज सरुप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिर नाई ।
केवट मीत कहे सुख मानत बानर बंधु बड़ाई ॥ ५

प्रेम-कनौड़ो रामसो प्रभु त्रिभुवन तिहुँकाल न भाई ।
तेरो रिनी हौँ कह्यो कपि सोँ ऐसी मानिहि को सेवकाई ॥ ६

तुलसी राम-सनेह-सील लखि, जो न भगति उर आई ।
तौ तोहिँ जनमि जाय जननी जड़ तनु-तरुनता गवाँई ॥ ७

है नीको मेरो देवता कोसलपति राम ..




11 February 2012

राग बिहाग

है नीको मेरो देवता कोसलपति राम ।
सुभग सरोरुह लोचन, सुठि सुंदर स्याम ॥ १

सिय-समेत सोहत सदा छबि अमित अनंग ।
भुज बिसाल सर धनु धरे, कटि चारु निषंग ॥ २

बलिपूजा चाहत नहीँ, चाहत एक प्रीति ।
सुमिरत ही मानै भलो, पावन सब रीति ॥ ३

देहि सकल सुख, दुख दहै, आरत जन-बंधु ।
गुन गहि, अघ-औगुन हरै, अस करुनासिंधु ॥ ४

देस-काल-पूरन सदा बद बेद पुरान ।
सबको प्रभु, सबमेँ बसै, सबकी गति जान ॥ ५

को करि कोटिक कामना, पूजै बहु देव ।
तुलसिदास तेहि सेइये, संकर जेहि सेव ॥ ६

सकुचत हौँ अति राम कृपनिधि ..


7 February 2012


राग बिलावल


सकुचत हौँ अति राम कृपनिधि ! क्योँ करि बिनय सुनावौँ ।
सकल धरम बिपरीत करत, केहि भाँति नाथ ! मन भावौँ ॥ १


जानत हौँ हरि रुप चराचर, मैँ हठि नयन न लावौँ ।
अंजन-केस-सिखा जुवति, तहँ लोचन-सलभ पठावौँ ॥ २

स्त्रवननिको फल कथा तुम्हारी, यह समुझौँ, समुझावौँ ।
तिन्ह स्त्रवननि परदोष निरंतर सुनि सुनि भरि भरि तावौँ ॥ ३

जेहि रसना गुन गाइ तिहारे, बिनु प्रयास सुख पावौँ

तेहि मुख पर-अपवाद भेक ज्योँ रटि-रटि जनम नसावौँ ॥ ४

'करहु ह्रदय अति बिमल बसहिँ हरि' कहि कहि सबहिँ सिखावौँ ।
हौँ निज उर अभिमान-मोह-मद खल-मंडली बसावौँ ॥ ५

जो तनु धरि हरिपद साधहिँ जन, सो बिनु काज गँवावौँ ।
हाटक-घट भरि धर्-यो सुधा गृह, तजि नभ कूप खनावौं ॥ ६

मन-क्रम-बचन लाइ कीन्हे अघ, ते करि जतन दुरावौँ ।
पर-प्रेरित इरषा बस कबहुँक किय कछु सुभ, सो जनावौँ ॥ ७

बिप्र-द्रोह जनु बाँट पर्-यो, हठि सबसोँ बैर बढ़ावौँ ।
ताहूपर निज मति-बिलास सब संतन माँझ गनावौँ ॥ ८

निगम सेस सारद निहोरि जो अपने दोष कहावौँ ।
तौ न सिराहिँ कलप सत लागि प्रभु, कहा एक मुख गावौँ ॥ ९

जो करनी आपनी बिचारौँ, तौ कि सरन हौँ आवौँ ।
मृदुल सुभाउ सील रघुपतिको, सो बल मनहिँ दिखावौँ ॥ १०

तुससिदास प्रभु सो गुन नहिँ, जेहि सपनेहुँ तुमहिँ रिझावौँ ।
नाथ-कृपा भवसिंधु धेनुपद सम जो जानि सिरावौँ ॥ ११

~* सीताराम सीताराम *~

Saturday, February 4, 2012

रामचंद्र ! रघुनायक तुमसोँ हौँ बिनती केहि भाँति करौँ ..




राग बिलावल

रामचंद्र ! रघुनायक तुमसोँ हौँ बिनती केहि भाँति करौँ ।
अघ अनेक अवलोकि आपने, अनघ नाम अनुमानि डरौँ ॥ १

पर-दुख दुखी सुखी पर-सुख ते, संत-सील नहिँ ह्रदय धरौँ ।
देखि आनकी बिपति परम सुख, सुनि संपति बिगु आगि जरौँ ॥ २

भगति-बिराग-ग्यान साधन कहि बहु बिधि डहकत लोग फिरौँ ।
सिव-सरबस सुखधाम नाम तव, बेँचि नरकप्रद उदर भरौँ ॥ ३

जानत हौँ निज पाप जलधि जिय, जल-सीकर सम सुनत लरौँ ।
रज-सम पर-अवगुन सुमेरु करि, गुन गिरि-सम रजतेँ निदरौँ ॥ ४

नाना बेष बनाय दिवस-निसि, पर-बित जेहि तेहि जुगुति हरौँ ।
एकौ पल न कबहु अलोल चित हित दै पद-सरोज सुमिरौँ ॥ ५

जो आचरन बिचारहु मेरो, कलप कोटि लगि औटि मरौँ ।
तुलसिदास प्रभु कृपा-बिलोकनि, गोपद-ज्योँ भवसिंधु तरौँ ॥ ६


Wednesday, February 1, 2012

सहज सनेही रामसोँ तैँ कियो न सहज सनेह ..


जनवरी ३१, २०१२


राग गौरी

सहज सनेही रामसोँ तैँ कियो न सहज सनेह ।
तातेँ भव-भाजन भयो, सुनु अजहुँ सिखावन एह ॥ १

ज्योँ मुख मुकुर बिलोकिये अरु चित न रहै अनुहारि ।
त्योँ सेवतहुँ न आपने, ये मातु-पिता, सुत-नारि ॥  २

दै दै सुमन तिल बासिकै, अरु खरि परिहरि रस लेत ।
स्वारत हित भूतल भरे, मन मेचक, तन सेत ॥ ३

करि बीत्यो, अब करतु है करिबे हित मीत अपार ।
कबहुँ न कोउ रघुबीर सो नेह निबाहनिहार ॥ ४

जासोँ सब नातोँ फुरै, तासोँ न करि पहिचानि ।
तातेँ कछु समुझ्यो नहीँ, कहा लाभ कह हानि ॥ ५

साँचो जान्यो झूठको, झूठे कहँ साँचो जानि ।
को न गयो, को जात है, को न जैहै करि हितहानि ॥ ६

बेद कह्यो, बुध कहत हैँ, अरु हौँहुँ कहत हौँ टेरि ।
तुलसी प्रभु साँचो हितु, तू हियकी आँखिन हेरि ॥ ७

~* सीताराम सीताराम *~




Sunday, January 29, 2012

श्रीहरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान ..


श्रीहरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान ।
जेहि सेवत पाइय हरि सुख-निधान भगवन ॥ १
परिवा प्रथम प्रेम बिनु राम-मिलन अति दूर ।
जद्यपि निकट ह्रदय निज रहे सकल भरिपूरी ॥ २
दुइज द्वैत-मति छाड़ी चरहि महि-मंडल धीर ।
बिगत मोह-माया-मद ह्रदय बसत रघुबीर ॥ ३
तीज त्रिगन-पर परम पुरुष श्रीरमन मुकुंद ।
गुण सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानंद ॥ ४
चौथि चारि परिहरहु बुद्धि-मन-चित-अहंकार ।
बिमल बिचार परमपद निज सुख सहज उदार ॥ ५
पाँचइ पाँच परस, रस, सब्द, गंध अरु रूप ।
इन्ह कर कहा न कीजिये, बहुरि परब भव-कूप ॥ ६
छठ षटबरग करिय जय जनकसुता-पित लागि ।
रघुपति-कृपा-बारि बिनु नहिं बुताइ लोभागि ॥ ७
सातैं सप्तधातु-निरमित तनु करिय बिचार ।
तेहि तनु केर एक फल, कीजै पर-उपकार ॥ ८
आठईँ आठ प्रकृति-पर निरबिकार श्रीराम ।
केही प्रकार पाइय हरि, ह्रदय बसहिं बहु काम ॥ ९
नवमी नवद्वार-पुर बसि जेहि न आपु भल कीन्ह ।
ते नर जोनि अनेक भ्रमत दारुन दुःख लीन्ह ॥ १०
दसईँ दसहु कर संजम जो न करिय जिय जानि ।
साधन बृथा होइ सब मिलहिं न सारँगपानि ॥ ११
एकादसी एक मन बस कै सेवहु जाइ ।
सोइ ब्रत कर फल पावै आवागमन नसाइ ॥ १२
द्वादसि दान देहु अस, अभय होइ त्रैलोक ।
परहित-निरत सो पारन बहुरि न ब्यापत सोक ॥ १३
तेरसि तीन अवस्था तजहु, भजहु भगवंत ।
मन-क्रम-बचन-अगोचर, ब्यापक, ब्याप्य, अनंत ॥ १४
चौदसि चौदह भुवन अचर-चर-रूप गोपाल ।
भेद गये बिनु रघुपति अति न हरहिं जग-जाल ॥ १५
पूनों प्रेम-भगति-रस हरि-रस जानहिं दास ।
सम, सीतल, गत-मान, ग्यानरत, बिषय-उदास ॥ १६
त्रिबिध सूल होलिय जरै, खेलिय अब फागु ।
जो जिय चाहसि परमसुख, तौ यहि मारग लागु ॥ १७
श्रुति-पुरान-बुध-संमत चाँचरि चरित मुरारि ।
करि बिचार भव तरिय, परिय न कबहुँ जमधारि ॥ १८
संसय-समन, दमन दुख, सुखनिधान हरि एक ।
साधु-कृपा बिनु मिलहिं न, करिय उपाय अनेक ॥ १९
भव सागर कहँ नाव सुद्ध संतनके चरन ।
तुलसिदास प्रयास बिनु मिलहिं राम दुखहरन ॥ २०